यह गली के कुत्ते

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नौकरशाह जब रिटायर होता है तो अपने अनुभव को आधार बनाकर मुख्य रूप से तीन बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है. पहला, किसी गैर सरकारी एजंसी में अपनी नियुक्ति को सबसे अधिक प्राथमिकता देता है. दूसरा, अखबारों में लेख लिखता है और उन सिद्धांतों की व्याख्या करना शुरू करते हैं जिनके बारे में वे खुद ठीक से कुछ नहीं जानते और तीसरा, जहां वे रहते हैं उस कालोनी या घेरेबन्द इलाके का मुखिया होने की कोशिश करते हैं. इन घेरेबंद कालोनियों की रेसिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशनों के मुखिया बनते ही उनका पहला और पसंदीदा कार्य होता है कालोनियों में विचरण करनेवाले गली के कुत्तों के खिलाफ अभियान.

दिल्ली में ऐसा ही होता है. नौकरशाहों के स्वर्ग इस शहर में हाल में ही दिल्ली में ऐसे ही लोगों के एक समूह ने उनके ‘पागल, पीड़ित पड़ोसियों’ से उन्हें बचाने के लिए उच्च न्यायालय में एक अर्जी पेश की है। इन नौकरशाहों के असभ्य जाहिल और गरीब पड़ोसी गली के आवारा कुत्तों को रोटी खिलाते हैं और उससे भी बड़ा अपराध ये कि उन्हें प्यार भी करते हैं. कालोनी निवासियों के हर घर में भले ही एक डॉगी डींगे भर रहा हो लेकिन इन निवासियों को यह मंजूर नहीं है कि सड़क पर रहनेवाले लोग सड़क पर विचरनेवाले कुत्तों को प्यार करें या उनका संरक्षण करें. इन सब लोगों के लिए अब यही एक आखिरी सहारा है अपने लिए न्याय और मन की शान्ति पाने का क्योंकि बहुत समय तक इन दिल्लीवासियों को अपने पड़ोसियों का उपहास, धमकियाँ, गालियाँ और ब्लैकमेलिंग का िशकार बनना पड़ा है क्योंकि वह अपनी गली के कुत्तो की परवाह करने का रोज `अपराध´ करते हैं।  सवाल यह है कि क्या अपनी गली के कुत्तो को पुचकारना या उन्हें खाना खिलाना एक `गलती´ है?

कोर्ट का निर्णय एक तरफ और सरकार द्वारा ऐसे आवारा कुत्तों की नसबंदी का प्रयास भी एक तरफ लेकिन हमारी सड़कों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों के बारे में हमें भी ठीक से जानने की जरूरत है। देश के कई शहरों में सरकारी एजेिन्सयाँ गैर सरकारी संघटनों के साथ मिलकर पशु जन्म नियंत्रण और टीकाकरण कार्यक्रम संचालित करती हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत के सड़क पर रहने वाल आवारा कुत्ते बेहद ही बुद्धिमान प्रजाति है जो दुनिया की सबसे पुरानी कुत्तों की नस्लों में से एक है।  यह प्रजाति एिशया और अफ्रीका में स्थापित पहली मनुश्य बस्तियों से इन्सानों के साथ खुशी-खुशी मौजूद रही हैं  वास्तव मेें शहरी बस्तियों में इन कुत्तों का प्राथमिक उद्देश्य मनुश्य की रक्षा करना और बची खुची खाद्य वस्तुओं का सेवन करके सफाई रखने में है।  यह ही वजह है कि आज भी गरीबों की बस्तियों में कुत्तों को ज्यादातर स्थानीय निवासी खाना खिलाते हैं।

पशु नसबंदी टीकाकरण और उन्हें पुन: अपने मूल क्षेत्र में छोड़ने का कार्यक्रम वैज्ञानिकों द्वारा इसका औचित्य सिद्ध करने में विश्व स्वास्थ्य संगठन को कई साल लगे हैं।  दुनिया भर की न्यायपालिकाओं, नागरिक संगठनों ने इस कार्यक्रम को अपनाया है और इसकी सफल्ता की कहानियाँ आज की तारीख में दुनिया के कई शहरों से सुनने को मिलती है, जिनकी शुरूआत अमरीका से हुई थी।  कुत्तों की नसबंदी करने की अवधारणा अमेरिका की सैन मात्तियो नामक काउन्टी के नागरिक अधिकारियों के दिमाग में तब आई जब उन्होंने देखा कि कुत्तों को मारने के उनका कार्यक्रम से उनकी आबादी में कोई गिरावट नहीं हो रही थी।  इसके बाद सैन मात्तियो काउन्टी ने कुत्तों का नसबंदीकरण कराने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी जो कि एक महान सफलता साबित हुई।  आज अमेरिका और कनाड़ा के विभिन्न भागों में इसका सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है।

नसबंदीकृत कुत्तों को उनके मूल निवास क्षेत्र पर बहाल करने के पीछे वैज्ञानिक सोच हैं कुत्ते प्रादेिशक जानवर हैं।  वे भोजन की उपलब्धि के आधार पर अपने प्रदेश को अंकित करते है। और बाहरी कुत्तों को अपने क्षेत्र में नहीं आने दते।  जब कुत्तों को अपने क्षेत्र से हटाया जाता है तो बाहर से दूसरे कुत्ते इस खाली क्षेत्र पर कब्जा कर लेंगे क्योंकि वहाँ भोजन स्त्रोत अभी भी उपलब्ध हैं  जब कोई बाहर का कुत्ता किसी कुत्ते के क्षेत्र में घुसता है तो उनके बीच में लड़ाइयाँ बढ़ती है और नसबन्धिकृत ना होने के कारण यह बच्चे पैदा करते रहते हैं और उस क्षेत्र में कुत्तों की संख्या बढ़ती रहती है।   इन बाहरी कुत्तों के नसबन्धिकृत और रेबीज के विरूद्ध टीकाकरण ना होने का कारण उस क्षेत्र के निवासियों के लिए खतरा बना रहता है।  एक नसबंधीकृत कुत्ते को रेबीज के विरूद्ध टीकाकरण भी किया जाता है, वह प्रजनंन नहीं करते, शान्त रहते हैं, अपने क्षेत्र को सुरक्षित  करते है औरी ना ही आपस में लड़ते-भौंकते है। एक नसबंधीकृत कुत्तों को उसके एक आधे-कटे कान से पहचाना जा सकता है।  पशु जन्म नियंत्रण दिल्ली में पिछले कई वर्षों से संचालित है – इन वर्षों में रेबीज के किस्सों में भी कमी आई है जो कि सरकारी और गैर-सरकारी संगंठनों की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि कुत्तों की जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिए जो कार्यक्रम विकसित देशों में काम करते है वह विकासशील देशों में असफल रहे हैं क्योंकि वहाँ पर शहरी स्थितियाँ हमारे यहाँ से बहुत अलग है।  भारत के शहरी पर्यावरण में ऐसी दो विशेषताएँ है जो आवारा जानवरों की आबादी में वृद्धि को प्रोत्साहित करती हैं :-  मलिन बिस्त्याँ और उजागर कचरा, जो कि विकसित देशों में मौजूद नहीं है।  विकसित देशों में आवारा कुत्तों का सड़क पर जीवित रहना असंभव है क्योंकि उन्हें सड़कों पर कुछ खाने को नहीं मिलता, इसलिए उन्हें पकड़ कर आश्रयघरों में ले जाया जाता है जहाँ उनकी नसबंदी करके उनका पुनर्वास करवाने का प्रयत्न किया जाता है।

कुत्तों की जनसंख्या को नियंत्रित रखने के लिए उन्हें `पकड़ने और मारने´ का कार्यक्रम अंग्रेजों  ने 19वीं सदी में शुरु किया था।  आजादी पाने के बाद भी भारत की नगरपालिकाओं ने इस कार्यक्रम को जारी रखा।  दिल्ली नगर निगम द्वारा किए गये एक अध्ययन के अनुसार 1980-1990 के दौरान 8 लाख कुत्तों का कत्लेआम करने के बावजूद दिल्ली में कुत्तों की संख्या 1.5 लाख ही रही और उसमें तिनके भर की कमी नहीं हुई। 1993 में नगर निगम ने स्वीकार किया कि कुत्तों को `पकड़ने और मारने´ की यह योजना पूरी तरह से रेबीज और कुत्तों की जनसंख्या को नियंत्रण करने में `असफल´ नही है।  इसलिए सन् 1994 में न्यायपालिका ने आदेश दिया कि कुत्तों की हत्या करनी बन्द करी जाए और उनकी `नसबंदी और टीकाकरण´ कार्यक्रम शुरू किया जाए जिससे पशु-जन्म नियंत्रण का कार्यक्रम भी कहा जाता है।  मुंबई, कोलकता, चेन्नई, जयपुर और हैदराबाद की उच्च न्यायालयों के भी ऐसे आदेश जारी करने के बाद इन शहरों में भी `पशु-जन्म नियंत्रण के लिए कुत्तों की नसबन्दीकरण और टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किए गए।  इस कार्यक्रम के तुरन्त अच्छे नतीजे देखने के बाद भारत सरकार ने 2001 में देश भर में इस कार्यक्रम को शुरू करने के आदेश दिए।

एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिस बात के लिए गली के कुत्ते बदनाम है वह हरकत वे बहुत कम करते हैं. कुत्तों के काटने की जो घटनाएँ होती हैं इनमें से बहुत कम आवारा कुत्तों की वजह से होती हैं।  अध्ययनों से पता चला है कि 90 प्रतिशत से भी अधिक कुत्तों के काटने की घटनाएँ पालतू कुत्तों की वजह से होती है जो कि अपने घर और क्षेत्र की सुरक्षा करते हुए आक्रमक हो जाते हैं।  हर साल पालतु कुत्तों की संख्या में वृद्धि हाती है और साथ ही कुत्तों के काट-खाने की घटनाओं में भी।  सिर्फ 5 प्रतिशत घटनाएँ आवारा कुत्तों की वजह से होती है जो या तो कुत्तों को कॉलोनी निवासियों द्वारा पीटे जाने या मादा कुत्तिया द्वारा उसके बच्चे को नुकसान पहुंचाए जाने के कारण इंसान पर हमला कर बैठती हैं।
गली के कुत्ते प्रकृति में शहर के कूड़े-करकट को साफ रखने का एक माध्यम है।  वह शहर में चूहों और अन्य कृतंक कीटों की संख्या को नियंत्रण में रखते हैं, जिनको नियंत्रण में रखना मानव के लिए मुिश्कल है।  यदि इन कुत्तों को भारत के शहरों से पूरी तरह हटा दिया जाए तो नाकि कूड़ा भारी मात्रा में जमा हो जाएगा बल्कि चूहों की संख्या भी हाथ से निकल जाएगी।  आज, जब भारत के कई शहर डेंगू और चिकुनगुन्या जैसी बीमारियों से अपनी मैली नागरिक स्थितियों के कारण जूझ रहे हैं, उस समय यह गली के कुत्ते ही है जो शहरों में चूहों की आबादी को जाँच में रखते है – चूहे `ब्युबोनिक प्लेग´ जैसी घातक बीमारी के वाहक हैं।  चूहों की एक जोड़ी पैदा होने के छ: सप्ताह के भीतर प्रजनन के लिए तैयार हो जाती है।  इस दर पर चूहो की एक जोड़ी प्रत्येक वर्ष के अंत तक 35000 चूहों में बदल जाती है।  आज की तारीख तक किसी भी नगर निगम ने चूहों का विनाश करने के लिए किसी भी योजना में एक पैसा भी आवंटित नहीं किया है। 1980 में गुजरात के सूरत शहर का भयानक प्लेग बीमारी से संक्रमित होने का एक कारण यह भी था कि स्थानीय नगरपालिका ने सूरत शहर की सड़कों पर रहने वाले कुत्तों को बेरहमी से मार डाला था।

भारत जैसे देश में सारे सड़क के कुत्तों को एकाग्रता िशविरों या डॉग-पाउण्ड में ठूस देना व्यावहारिक रूप से असंभव है।  ऐसे कार्य को करने के लिए जगह, समय और संसाधन सरकार कहाँ से पैदा करेगी। जब झुग्गी बस्तियों में रहने वालों या आवासीय क्षेत्रों से वाणििज्यक प्रतिष्ठनों को बाहर निकालने के लिए तो कोई जगह है नहीं। इसलिए समझदारी तो बस इसमें है कि सड़क के कुत्तों को उनकी जगह पर रहने दिया जाए। असल में हर जिम्मेदार और मानवीय निवासी कल्याण संघ को इस कार्यक्रम का भागीदार बनना चाहिए और अपने शहर में काम करने वाली नगर पालिकाओें द्वारा संचालित पशु-जन्म नियन्त्रण कार्यक्रम के अन्तर्गत अपने क्षेत्र के आवारा कुत्तों का नसबंदीकरण और नियमित टीकाकरण कराना चाहिए।  पशुओं के मामले में स्वामित्व का सवाल तो उठता ही नहीं है, जब हम आज आदिवासियों को उस वन भूमि पर रहने का अधिकार देने वाले बिल को पारित करने की बात करते है जहाँ यह आदिवासी सदियों से जी रहे है तो पशुओें के मामले में उनका जन्मसिद्ध अधिकार उसी जगह पर रहने का है जहाँ वो पैदा हुए हैं।

कुत्तों की हत्या करके रेबीज पर नियंत्रण पाने के कार्यक्रम कई विकासशील  देशों में जैसे कि – पाकिस्तन, इरान, इराक, साउदी अरब, उत्तर कोरिया, अफगानिस्तान, जार्डन, सीरिया, यमन, बांगलादेश, नेपाल, यूक्रेन, उज्बेकिस्तान – हर जगह ही `नाकाम´ रहे हैं।  कुत्ता आदमी का सबसे ईमानदार और वफादार दोस्त है और हम में से कई लोगों को जरा सा भी नुकसान नहीं होगा अगर हम अपने गली में रह रहे एक कुत्ते को दिन में एक बार अगर कुछ खिला या पिला दिया करें।  अगर हम यह करें तो मैं दावे के साथ यह कह सकती हूँ कि आपको अपने घर के दरवाजे पर हमेशा अपनी पूंछ फड़फड़ाता एक साथी नज़र आएगा जो रोज शाम आपके थकान भरे दिन के बाद आपका दिल खोलकर स्वागत करेगा। इस बेहद स्वार्थी दुनिया में बिना शर्त प्यार और सम्मान की लालसा हम सब करते है और शायद इस लालसा की पूर्ति करने के लिए आपका बेहतरीन साथी आपकी गली का कुत्ता है।

This article was first published here

{The above  Video was made for a group by the name of ‘People for Animals’, we are sharing and embedding it here on Jaagruti because it beautifully communicates the story of the Indian Street Dog}

One Comment on “यह गली के कुत्ते

  1. Vasudhaji,
    Good article for welfare of mankind.Still needs extensive add on FM & electronic media especially Delhi where people are arrogant & adamant on getting dogs removed from locality.

    Like

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