कुत्तों के लिए भी संकट बना माओवाद

(Pics Credit and Courtesy: Prashant Ravi/BBC News)

केंद्र सरकार के माओवादियों के खिलाफ छेड़े गए ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के चलते, लगभग तीन हफ्ते पहले, पश्चिम बंगाल में पश्चिमी मिदनापुर, लालगढ़, बांकुरा, पुरुलिया और बर्दवान के अनेकों गाँवों में माओवादियों द्वारा एक अनोखा ‘फतवा’ जारी किया गया. इन गाँव में रहने वाले लोगों और आदिवासियों को कहा गया कि ‘वह अपने इलाके के सारे पालतू और सड़क के कुत्तों को मार डालें नहीं तो उन्हें मार दिया जाएगा’.

इसी फतवे के डर से, और अपनी जान बचाने के कारण या तो कई लोगों ने अपने हाथों से अपने द्वारा लाड-प्यार से पाले गए अपने कुत्तों के खाने में ज़हर मिलाकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया या फिर बेलपहाड़ी गाँव के निवासी तरुण सेनगुप्ता कि तरह अपने कुत्तों को अपने रिश्तेदारों के पास दूसरे गाँव में भेज दिया. एक तरफ अगर पश्चिम बंगाल के सिलदा गाँव में लगे पुलिस कैंप में दिन-दहाड़े माओवादी हमला कर बीसियों पुलिस वालों को मार-गिरा सकते हैं, तो ऐसे में आखिर गाँव वाले करें भी तो क्या- अपनी जान बचाएं या अपने कुत्तों की?

माओवादी आन्दोलन का जन्म 1967 में पश्चिम बंगाल के ही नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ था जिसने आज इतना आतंकी रूप ले लिया है.  अब सरकार और माओवादियों के बीच में बैर क्यों है, यह तो हममें से कई लोग जानते हैं, पर आखिर पालतू एवं गली के कुत्तों से इन नक्सलियों का क्या बैर है? इसका कारण है सिर्फ एक, अपने इलाके में बसने वाले इंसानों के द्वारा डाले गए भोजन से पलने वाले यह कुत्ते इन गाँव-बस्तियों के गैर-नियुक्त चौकीदार बन गएँ हैं, जो बड़ी वफादारी से अपने इलाके कि बाहरी, असामाजिक तत्वों से सुरक्षा भी करते हैं और इन्हें अपनी बस्तियों के आस-पास होता महसूस कर भौंक उठते हैं. कुत्तों की इसी भौंक से ना केवल गाँव वाले बल्कि इन माओवादियों के खिलाफ जुटी पुलिस और सैन्य बालों के कर्मचारी भी चौकन्ने हो जाते हैं. पिछले महीने में पश्चिम बंगाल में ही हुई ऐसी दो वारदातों के घटते शायद माओवादियों ने ऐसा फतवा जारी किया, क्योंकि अब इन कुत्तों की मौजूदगी इनके लिए घातक साबित हो रही थी. यह दो वारदातें अज्नाशुली और सालबोनी जिलों में हुईं थी, जिसमे कुत्तों के भौंकने से चौकस हुए पुलिस दस्तों ने कई माओवादियों को ढेर कर दिया था.

यह वारदातें अनोखी नहीं हैं. अनेकों बार इंसानों के सबसे वफादार दोस्त माने जाने वाले इन ‘गली के कुत्तों’ ने लोगों को चोर, लुटेरे, आतंकियों से चौकन्ना करने में मदद की है. इसका एक ताज़ा उदाहरण आगरा शहर से भी है. जनवरी महीने में ईदगाह और मोहनपुरा इलाके में दो दिन में 25 से अधिक कुत्ते मारे गए, जांच-पड़ताल करने से सामने आया कि शायद इन कुत्तों को चोरो के एक गुट ने ज़हर देकर मार डाला है, क्योंकि इनके रात को भौंकने कि वजह से वह चोरी नहीं कर पा रहे थे. इस इलाके के निवासियों कि बात माने तो इन कुत्तों के मरने के उपरान्त इस इलाके में चोरी की ढेरों घटनाएं हो चुकी हैं. इन से पहले भी ऐसे कई किस्से सुनने में आयें हैं जब पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भी सीमा-पार से घुसने वाले घुसपैठिये और आतंकियों ने अपने डेरे डालने से पहले गाँव के कुत्तों का खात्मा किया है, ताकि वह सेना के जवानों को अपनी भौंक से सचेत ना कर दें…अशांत इलाकों में जमे भारतीय सेना के अनेकों दस्तें अपने कैंप के आस-पास बसे कुत्तों को खाना डालते हैं, और इनसे दोस्ती करते हैं ताकि किसी भी खतरे या हमलावर की मौजूदगी का आभास होते ही यह कुत्ते भौंक कर उन्हें होशियार कर सकें.

2003 में बिहार के जेहान्नाबाद शहर से 40 km दूर स्तिथ परैया गाँव की पुलिस चौकी पर हुए माओवादी हमले में 3 पुलिसकर्मी मारे गए थे. इसके बाद अपनी सुरक्षा के संसाधनों के आभाव से झूझ रही परैया पुलिस ने दस्त लगाते वक़्त गली के कुत्तों का सहारा लेना शुरू किया. सुनने में यह आया था कि इस छोटे से पुलिस चौकी के कर्मचारियों ने अपनी तन्ख्वायों में से पैसे बचा चौकी के पास रह रहे गली के कुत्तों को रोज़ ड़ाल-चावल और रोटी डालते हैं. गौर फरमाने कि एक बात यह भी है कि आज भी हमारे देश में हज़ारों गाँव में बिजली नहीं पहुंची और नक्सल-पीड़ित इन जंगल वाले इलाकों में जो बिजली पहुँचती है वह भी ना के बराबर है. ऐसे में इन पुलिस चौकियों पर तो रात को बिजली होती ही नहीं है, और इसी कमी का फायदा माओवादी संघटन रात को उठाते हैं और अंधरा होने पर वह इन पुलिस चौकियों पर निशाना साधते हैं. तभी रात को चुस्त-दरुस्त रहने वाले इन गली के कुत्तों की भौंकने की आवाज़ सुनते ही, यह पुलिस कर्मी होशियार हो जाते हैं और अपनी टोर्च जला लेते हैं. एस करके उन्हें अपने आपको माओवादियों से बचाने का मौका पा लेते हैं.

गृह मंत्रालय और Bureau of Police Research and Development ने भी 2003 में झारखण्ड के नक्सल-पीड़ित इलाकों में स्थित बैंक और डाकघरों को लाइसेंसधारी गार्ड और कुत्तों को रखने कि सलाह दी थी. विलायती कुत्तों के महंगे होने के कारण इन्हें रखना और ट्रेन करना हर किसी के बस की बात नहीं है, इसलिए यहाँ के कई बैंकों और डाकघरों ने पड़ोस में रह रहे गली के कुत्तों को खाना डालके इनसे दोस्ती कर इन्हें ही अपना रक्षक बनाया और अब यही दिन-रात चौकीदारों के साथ मिलकर इन इमारतों की सुरक्षा करते हैं. मई 2005 में आंध्र प्रदेश में हैदराबाद से 340 किलोमीटर दक्षिण की और स्थित ‘दुर्गी गाँव’ में गली के कुत्तों के भौंकने से सतर्क हुए पुलिसकर्मियों ने पुलिस कैंप को एक बड़े माओवादी हमले से को बचा लिया था. इस घटना के बाद तब आंध्र प्रदेश पुलिस के डी.आई.जी स्वर्णजीत सेन ने नक्सल-पीड़ित इलाके में स्तिथ पुलिस चौकियों के पुलिस कर्मियों को आदेश दिए थे कि वह अपनी चौकियों के आस-पास रह रहे कुत्तों को रोज़ खाना ड़ाल उनसे दोस्ती बढाएं, ताकि पुलिस चौकियों को माओवादियों के हमले से बचाया जा सके. जैसा कि अक्सर देखा गया है, पुलिस चौकियां और सैन्य बलों के कैंप ही माओवादियों के धावा बोलने के मन-पसंद निशाने हैं.

छत्तीसगढ़ प्रांत में तो इन गली के कुत्तों ने इतिहास ही रच डाला और अप्रैल 2009 में बस्तर ज़िले में आम-चुनावों के दौरान तेजा, करीना, सैली और लिली नामक चार गली के कुत्तों ने पुलिस वालों के साथ इस घने जंगल वाले इलाके में तब मोर्चा संभाला जब माओवादियों ने इस इलाके में ढेरों भूमिगत विस्फोटक मैईन (landmine) बिछा दी थीं और गांववालों को आम-चुनावों का बहिष्कार करने को कहाँ था…. एक सच्च यह भी है कि नक्साली इलाकों में 95 प्रतिशत सुरक्षाकर्मियों कि मौत IED फटने से होती हैं. इन चारों कुत्तों कि इस अनोखे मुकाम तक पहुँचने की कहानी कुछ ऐसे है -माओवादी गतिविधियों से प्रताड़ित इस राज्य में 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा CTJWC (Counter Terrorism and Jungle Warfare College) की कांकेर ज़िले में स्थापना की गई. इसकी अध्यक्षता संभालने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने भारतीय सेना से सेवा निवृत हुए ब्रिगेडियर बी.के. पोंवर को बुलाया, जो इससे पहले मिज़ोरम में सेना के विख्यात Counter insurgency and Jungle Warfare School की अध्यक्षता संभाल रहे थे. जुलाई  2007 में CTJWC के कैम्पस में घूमते हुए उनकी नज़र चार हृष्ट-पुष्ट गली के कुत्ते के पिल्लों पर पढ़ी. उन्होंने इन पिल्लों को उठाया और इन्हें CTJWC में Sniffer Dog की ट्रेनिंग देने वाले दस ट्रेनरों के हवाले कर दिया. आम तौर पर Sniffer Dogs की भूमिका के लिए विलायती pedigreed कुत्तों को ट्रेन किया जाता है (जैसे कि- लाब्राडोर, अल्सेशियन, जर्मन शेफर्ड, कोकर स्पेनियल और डोबेर्मन). पर इस बार पोंवर साब ने गली के कुत्तों को 9 महीने के कड़े ‘कुत्तों के IED (Improvised Explosive Device) Detection Training कुरसे’ में इनका दाखिला करा दिया. 9  महीनों की कड़ी ट्रेनिंग के बाद, यानी 1 अप्रैल 2008 को, यह चार पिल्ले – करीना, लिली, तेजा और सैली CTJWC के इस ट्रेनिंग कार्यक्रम से स्नातक होकर निकले. इस ट्रेनिंग में उन्हें ज़मीन में 6-12 इंच नीचे दबी IED को सूंघ के पहचानने की ट्रेनिंग दी गयी थी. इन चारों की काबलियत से प्रसन्नचित होकर दो और गली के कुत्तों- रामबो और मिल्ली को ट्रेनिंग course में शामिल कर लिया था…और यह तो बस शुरुआत है.

पिछले साल बस्तर ज़िले में चुनाव वाले दिन CTJWC  के अध्यक्ष बी.के. पवार ने पत्रकारों के साथ हुई एक बातचीत में इन गली के कुत्तों की माओवादियों से निपटने में सक्षम होने की खूबियों पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि गली के कुत्तों को ऐसे कार्यों में ट्रेन करने के अनेक फायदे है, पहला यह कि जहाँ कुत्तों की pedigreed प्रजातियों के पिल्ले बाज़ार में 85,000-1,25000 रूपये प्रति मिलते हैं, जबकि गली के कुत्ते मुफ्त हैं! इसके इलावा यह गली के कुत्ते होशियार हैं, समझदार हैं, चुस्त-दरुस्त हैं, रात को भी ऑपरेशन के दौरान इनकी आँख नहीं लगती और यह सतर्क रहते हैं..साथ ही इन्हें इन इलाकों के अधिक तापमान में रहने कि आदत है, घने-जंगली और मुश्किल इलाकों में यह स्फूर्ति से घूम-चल पाते हैं..यहाँ तक कि कभी कभी एक दन में 25 किलोमीटर तक चलने में भी यह गली के कुत्ते सक्षम पाए गए हैं और नक्सल पीड़ित जंगली इलाकों में घूमते वक़्त ना तो यह गर्मी से परेशान होते हैं और ना ही बीमार होकर वेट डॉक्टर का खर्चा बढ़ाते हैं..अक्सर गर्मी के कारण अल्सेशियन और लाब्राडोर कुत्ते (sniffer dogs) जंगल में बीमार पड़ गए हैं, जिससे पुलिसकर्मियों को कभी-कभी परेशानी हुई है..क्योंकि कई बार नक्सालियों के खिलाफ कार्यवाही कई दिनों तक जंगल में चलती है और बीमार कुत्तों को लेकर घूमने में परेशानी भी हो जाती है…ऐसे में पोंवर साहब कहते हैं, “आखिरकार यह गली के कुत्ते लोकल हैं, अपने इलाके से प्रेम करते हैं और इसकी सुरक्षा के प्रति वफादार हैं, यह हमारी नाक नहीं कटवा सकते. साथ ही हमें यह समझना पड़ेगा कि अशांत, आतंक और नक्सल पीड़ित इलाकों में तो वृद्धि हो रही है और sniffer dogs की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर है, इसलिए ऐसे में गली के कुत्तों के समझदार होने का, इनके असामाजिक तत्वों से निपटने में निपुण होने के कारण हमारा इन कुत्तों का सुरक्षा सम्बन्धी कार्यवाहियों में इस्तेमाल करना एक समझदारी पूर्ण निर्णय होगा”.

माओवादी इलाकों में तैनात हमारे पुलिस दल की हालत तो फिलहाल खस्ता है, आये दिन किसी न किसी के मारे जाने या सर काटने की खबर सुनने को मिलती है…हमारे पुलिस कर्मियों और सैन्य बालों के हत्यार पुराने हैं और अन्य संसाधनों की भी कमी है…ऐसे में जहाँ नक्सल-पीड़ित गाँव में बसने वाले लोगों के सुरक्षा पुलिस के हाथ में है, वहां ही इन पुलिसकर्मियों और सैनिकों की सुरक्षा शायद इन वफादार गली के कुत्तों के हाथ में है…पर अब तो इन गली के कुत्तों की जान लेने के भी माओवादियों ने फतवे जारी कर दिए हैं, अब ऐसे में क्या किया जाए?

Edit Page_Amar Ujala Dated 10th March, 2010

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